कयोंकि तुम थे ना

कयोंकि तुम थे ना,

इसीलिए सब रंगीन सा था |

खुशी, 

हंसी,

और मैं, साथ ही रहते थे तीनो |

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कहते ‌‌‌हैं लोग मैं भटक गई थी

कहते ‌‌‌हैं लोग मैं भटक गई थी;

लगता है जैसे कल ही की तो बात हो,

तू और मैं एक बार फिर साथ हो,

फिर वही बारिश, वही रात हो

और एक दफ़ा फिर वही हसीन मुलाक़ात हो।‌‌

 

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तब तुम शायद समझ पाओ मैं क्या सोचता हूँ

आंखों से नफरत की जो पलकें हटा ते,

तो तुम जान लेती मैं क्या सोचता हूँ|

 

मेरी तरह होता अगर हम पे भरोसा,

तो कुछ दूर साथ साथ तुम भी आती|

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किसी रोज़ आना मेरे दर पे

किसी रोज़ आना मेरे दर पे, तुम्हे अपनी ज़िन्दगी की कहानी सुनाऊँगा,

तुम्हे बैठा के, इत्मिनान से, प्यार से,

आहिस्ता-आहिस्ता अपने सारे किस्से बतलाऊँगा।

 

इत्तेफाक से किसी दिन तुम आई,

तो अपने बचपन की सैर करवाऊँगा।

4 साल से 14 साल तक जो भी किया उसका चित्र बनाऊँगा।

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तुम अनंत हो

तुम हंसो तो लगता है कि हां! कुछ तो है इस ज़िन्दगी में देखने के लिए।

रो तो लगता है कि क्या ना कर दूं हन होंठों की हंसी को वापिस लाने के लिए।

कुछ इसे हमारा जुनून समझ सकते हैं, कुछ प्यार।

पर ये जो हम मेहसूस करते हैं ना तुम्हारे लिए?

जो जुनून और प्यार ये लोग समझते हैं ना?

उससे कहीं ऊपर है ये।

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