तुम अनंत हो

तुम हंसो तो लगता है कि हां! कुछ तो है इस ज़िन्दगी में देखने के लिए।

रो तो लगता है कि क्या ना कर दूं हन होंठों की हंसी को वापिस लाने के लिए।

कुछ इसे हमारा जुनून समझ सकते हैं, कुछ प्यार।

पर ये जो हम मेहसूस करते हैं ना तुम्हारे लिए?

जो जुनून और प्यार ये लोग समझते हैं ना?

उससे कहीं ऊपर है ये।

 

क्या बताऊं मैं लोगों को कि तुम क्या हो मेरे लिए?

जब तुम खुद ही नहीं जानते कि वाकई में तुम मेरे लिए क्या हो।

मज़े की बात तो ये है कि हम लफ़्ज़ों में बयां भी नहीं कर पाते,

वो क्या है ना, हाथ थोड़ा तंग है हमारा लफ्ज़ों को ज़ुबान से बयां करने में।

हां! लेकिन तुम अगर चाहो ना,

तो मेहसूस ज़रूर कर सकोगी जो ये ज़ुबान बयां नहीं कर पाती।

 

“तुम से प्यार है”। अगर ये बोलूंगा तो बेइज्जती होगी उस चाहत की जो तुम्हारे लिए मैं रखता हूं।

क्यूंकि ये चाहत महज़ प्यार तक सीमित नहीं रह गई है,

तुम को जीते हैं हम, तुम पर मरते हैं हम।

हां आज भी कांप उठते हैं, ये सोच के कि कहीं तुम दूर ना हो जाओ।

क्यूंकि केवल मैं और मेरा खुदा जानता है कि तुम्हें ज़िंदगी में रखने के लिए कितनी दुआए मांगी है, कितने आंसू बहाए हैं।

 

ये स्याही और शब्द भी खत्म हो जाते हैं जब तुम्हें बयां करना शुरू करता हूं,

वो भी जानते हैं कि वो काफी नहीं हैं तुम्हें बयां करने के लिए मेरे द्वारा।

क्यूंकि तुम अनंत हो, मेरे लिए।

और अनंत का बख़ान करना मेरे तो क्या, किसी के बस की बात नहीं।

©  दीप पटेल, लेखक