तब तुम शायद समझ पाओ मैं क्या सोचता हूँ

आंखों से नफरत की जो पलकें हटा ते,

तो तुम जान लेती मैं क्या सोचता हूँ|

 

मेरी तरह होता अगर हम पे भरोसा,

तो कुछ दूर साथ साथ तुम भी आती|

 

रात के इन अकेले लम्हो में,

ढूंढता हूँ तुम्हे कभी कभी|

 

जब ये रातें तुम्हे सोचकर निकाल देता हूँ,

तब तुम शायद समझ पाओ मैं क्या सोचता हूँ|

©  करण प्रताप