किसी रोज़ आना मेरे दर पे

किसी रोज़ आना मेरे दर पे, तुम्हे अपनी ज़िन्दगी की कहानी सुनाऊँगा,

तुम्हे बैठा के, इत्मिनान से, प्यार से,

आहिस्ता-आहिस्ता अपने सारे किस्से बतलाऊँगा।

 

इत्तेफाक से किसी दिन तुम आई,

तो अपने बचपन की सैर करवाऊँगा।

4 साल से 14 साल तक जो भी किया उसका चित्र बनाऊँगा।

 

तो अपने जवानी का हर एक किस्सा बताऊँगा,

15 साल से 25 साल तक जहां भी गया, जैसे भी जिया वो सब सुनाऊँगा ।

तो अपनी जवानी का ढलना भी अजब दर्शाऊँगा,

26 साल से 36 साल तक कैसे उतार चढ़ाव झेले ये भी दिखलाऊँगा।

 

किसी रोज़ आना मेरे दर पे, तुम्हे अपनी ज़िन्दगी की कहानी सुनाऊँगा, तुम्हे बैठा के,

इत्मिनान से, प्यार से, आहिस्ता-आहिस्ता अपने सारे किस्से बतलाऊँगा।

ये भी बताऊँगा की मैं यहां तक कैसे पहुँचा?

की कैसे मैंने अपनी हर एक मुश्किल का सहारा लिया,

की कैसे मैंने हिम्मत तो नही खोई अपनी, पर दोबारा जिया।

 

ये भी बताऊँगा की मैंने अपना कीमती पल कहाँ खोया?

की कैसे मैंने खोये हुए उन पलों के सहारा लिया,

की कैसे मैंने खो कर उनहीं पलों को अपने ख्वाबों में दोबारा जिया।

 

ये भी बताऊँगा की क्यों नही जी पाता था मैं उसके बिना?

की कैसे उसकी तसवीरें, उसकी चीजों का सहारा लिया,

की कैसे मैंने उससे नफरत तो नही की, पर उस प्यार से दोबारा जिया।

 

किसी रोज़ आना मेरे दर पे तुम्हे अपनी ज़िन्दगी की कहानी सुनाऊँगा, तुम्हे बैठा के,

इत्मिनान से, प्यार से, आहिस्ता-आहिस्ता अपने सारे किस्से बतलाऊँगा।

फिर,

तुमसे पूछूंगा की क्या मेरी काहानियाँ तुम्हारे दिल को छू रही हैं? या फिर बस उन्हें सुनना तुम्हारी मजबूरी है?

तुमसे जानूँगा, की क्या मैंने कुछ गलत किया? जिसके जवाब में तुम “अरे नही-नही, बिल्कुल नही।” बोल कर मेरा दिल

रखोगी।

 

तुमसे सुनूंगा, की मैंने ऐसी कौन सी गलतियाँ कर दीं थीं की वो मुझसे इतना दूर हो गया।

जिसमे तुम मुझे “तुम गलत नही थे, बस वो तुम्हे समझ नही पाया।” सुना कर मेरा दिल रखोगी।

किसी रोज़ आना मेरे दर पे तुम्हे अपनी ज़िन्दगी की कहानी सुनाऊँगा, तुम्हे बैठा के,

इत्मिनान से, प्यार से, आहिस्ता-आहिस्ता अपने सारे किस्से बतलाऊँगा।

तुम सुनना तो चाहोगी ना? तुम जानना चाहोगी ना? तुम एक न एक दिन मेरी दहलीज़ पर तो आओगी ना?

 

तुम्हारा जो भी फैसला हो, मैं बस इतना ही कहूँगा,

की,

किसी रोज़ आना मेरे दर पे तुम्हे अपनी ज़िन्दगी की कहानी सुनाऊँगा, तुम्हे बैठा के,

इत्मिनान से, प्यार से, आहिस्ता-आहिस्ता अपने सारे किस्से बतलाऊँगा।

©  अंकिता कपूर , लेखक