कहते ‌‌‌हैं लोग मैं भटक गई थी

कहते ‌‌‌हैं लोग मैं भटक गई थी;

लगता है जैसे कल ही की तो बात हो,

तू और मैं एक बार फिर साथ हो,

फिर वही बारिश, वही रात हो

और एक दफ़ा फिर वही हसीन मुलाक़ात हो।‌‌

 

पर;

जैसा माँ ने बताया था,

समय बहुत बलवान है।

जैसे कभी मुझमें थी,

वैसे ही आज किसी और में बस्ती तेरी जान है।‌

याद भी हूँ मैं तझे,

क्या आज तुझे मेरी पहचान है?

या ‌मेरी शख्सियत तेरे लिए

एक फिर बार अंजान है?

 

सच कहुँ;

कभी-कभी फिर भटकने को दिल करता है,

याद तेरी आ जाती है जब

तो तेरी आवाज़ फिर सुनने को दिल करता है,

तुझे फिर चाहने को दिल करता है,

उस भटके हुए समय में

एक बार फिर लौट जाने को दिल करता है।

 

पर;

यह दिल भी बड़ा नादान है

और शायद हम दोनों केे ही अब

एक दूसरे से अलग आसमान है।

ना मैं वैसी रही हूँ

और तू भी तो एक अधूरा सा, नया इंसान है।

बात तो सीधी है,

पर समझना ना आसान है,

की कहते हैं जो लोग मैं भटक गई थी,

मालूम नहीं उनको की यह दिल आज भी

तेरे ही नाम है।

तेरे ही नाम है।

©  सृष्टि रघुवंशी,  लेखक