कयोंकि तुम थे ना

कयोंकि तुम थे ना,

इसीलिए सब रंगीन सा था |

खुशी, 

हंसी,

और मैं, साथ ही रहते थे तीनो |

 

कयोंकि तुम थे ना,

इसीलिए सब हसीन सा था |

ना वक्त का डर, 

और ना सीमाओं की खबर,

बस यूं ही रहती थी मैं,

कुछ मुख्तलिफ़ सी |

 

कयोंकि तुम थे ना,

इसीलिए सब ज़रीन सा था |

बात-बात पर महक उठती थी मैं,

तुम्हारी आहट पर चहक उठती थी मैं |

 

कयोंकि तुम थे ना, 

इसीलिए सब नाजनीन सा था |

बेवजह मुसकुरा देती थी,

तुम्हारे नाम पर शरमा देती थी|

 

कयोंकि तुम थे ना,

इसीलिए सब नवीन सा था |

मानो जैसे ये हवाएँ भी सदाएँ देने लगी हो,

और सागर की ओर बहती हुई वो शिप्रा, 

इशारे करने लगी हो |

 

कयोंकि तुम थे ना,

इसीलिए सब दिलनशी सा था |

किसी मादक द्रव्य की तो जैसे जरूरत ही नहीं थी,

तुम्हारी रुहानियत का नशा ही इतना गहरा था,

जबसे इस नयी कायनात से रू-ब-रू कराया था तुमने,

एक नयी हयात का एहसास मुझे हुआ था |

 

कयोंकि तुम थे ना,

इसीलिए सब बेहतरीन सा था |

इस मरासिम को क्या नाम देती,

मेरे लिए तो इक्तिहार, ख्वाबिदा प्यार, आशना, फ़ितूर, नूर, वस्ल और इनायत,

सब था |

 

कयोंकि तुम थे ना,

बस,

एक सुकून सा था |

कयोंकि,

कयोंकि तुम थे ना |

©  सृष्टि रघुवंशी,  लेखक